बुधवार, 7 अप्रैल 2010

मंदिर मस्जिद

मंदिर के मुंडेर पर फ़ॉन्ट का आकार
बैठा एक कबूतर
ताड़ रहा था सामने
मस्जिद की छत को

मंदिर से मस्जिद की
दूरी थी दस कदम
एक तो सूरज की तपिश
ऊपर से बाजू भी बेदम

इन हालातो में कुछ यूँ हुआ
सामने से नन्हे फरीद ने
मंदिर की छत की ओर कदम बढाये
और कबूतर को हाथो में लिया

नन्हे फरीद ने धर्म की दीवार को
मानवता से तोड़ दिया
और कबूतर पर पास
कमंडल को उड़ेल दिया










सोमवार, 5 अप्रैल 2010

चेहरा

कुछ चेहरे है खिले हुए
कुछ चेहरे है लघु उदास
हर चेहरा एक राज छुपाये
हर चेहरा बनता है हर चेहरा खास

कभी बच्चे सी चंचलता
कभी सिंह सा क्रोध लिए
गौर से देखो हर चेहरे को
जो जीवन का सन्देश लिए

पल में हँसता पल में रोता
हर चेहरा अलबेला है
दिल को देखो चेहरा छोडो
इसमें बड़ा झमेला है

-रवि प्रकाश केशरी

शनिवार, 5 सितंबर 2009

chhanikayen

astitva

jang jitne ki 

jindagi ki ladayi

astitva me aayi 

manav ki parchhayen

सोमवार, 25 मई 2009

तकलीफ

बस इतनी सी तकलीफ
मेरे दिल में मौजूद है
मेरे दिल तोड़ने वाला शख्स का
मेरे दिल में वजूद है !

अब तन्हाइयों बिना
जीने से डर लगता है
हर चेहरे में उसका बस
बस उसका अक्स दिखताहै !

खामोश लब झुकी निगाहें
इस बात का करती बयां है
बिना उसके मेरे लिए
क्या जमीं क्या आसमा !


-रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

गुरुवार, 7 मई 2009

चुनाव पर्व

पांच साल में एक बार
आता यह त्यौहार
जनता के आगे हाथ जोड़ते
सत्ता के ठेकेदार !


सत्ता के ठेकेदार
मिलजुलकर कर बतियाते है
गर गलती से जीत गए
तो मिलकर सब चट कर जाते है !


कहे केशरी इन लोगो की
कोई नही जमात
सत्ता में आते ही मारे
जनता को दो लात !

- रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

शनिवार, 4 अप्रैल 2009

वोट तंत्र

वोट तंत्र के दौर में
कितने हुए बर्बाद
जली झोपड़ी पब्लिक की
महल हुए आबाद!

दिन में जो बतियाते थे
हर वादे पर हामी भरते थे
वो शाम ढले छुप जाते है
अपनों को गैर बताते है !

नित बदलते मौसम में
बदला नेताओं का चोला
पहले पहनते थे खादी
अब साथ में रखते हैं झोला!

गर चाहो अपनी खुद्दारी
तो दूर भगाओ खद्दरधारी
सच्चे अच्छे को देकर वोट
दिखाओ अपनी समझदारी !

शुक्रवार, 6 मार्च 2009

नारी {८ मार्च नारी दिवस विशेष }

वर्षो से जकड़ी जंजीरे
तोड़ दे सरे बंधन
नित आगे बढ़ने से तेरा
होगा हरदम अभिनन्दन !


घर की ऊँची दीवारों में
तू क्यों आंसू रोती है
दिया ईश ने तुझको शक्ति
फ़िर क्यो अबला बनती है !

तू सीता है तू सावित्री
तू इंदिरा तू लक्ष्मीबाई
तेरे चरणों में हरदम
दुनिया शीश झुकाती आई !

तू शिव की शक्ति है
और ईश की माया
तेरे को जिसने दुत्कारा
वो पीछे पछताया !

उठ जा तन जा हो तैयार
जग से ले लोहा एक बार
तेरे बुलंद हौसले से होगी
होगी तेरी विजय हर बार !

-रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी



रविवार, 22 फ़रवरी 2009

होली


होली


रंग फुहारों से हर ओर

भींग रहा है घर आगंन

फागुन के ठंडे बयार से

थिरक रहा हर मानव मन !




लाल गुलाबी नीली पीली

खुशियाँ रंगों जैसे छायीं

ढोल मजीरे की तानों पर

बजे उमंगों की शहनाई !




गुझिया पापड़ पकवानों के

घर घर में लगते मेले

खाते गाते धूम मचाते

मन में खुशियों के फूल खिले !




रंग बिरंगी दुनिया में

हर कोई लगता एक समान

भेदभाव को दूर भागता

रंगों का यह मंगलगान !




पिचकारी के बौछारों से

चारो ओर छाई उमंग

खुशियों के सागर में डूबी

दुनिया में फैली प्रेम तरंग !



- रवि प्रकाश केशरी

वाराणसी




बुधवार, 21 जनवरी 2009

गणतंत्र

ले हाथों में ध्वज तिरंगा
झूम झूम कर गायें
नित उत्कर्ष हो भारत का
मिलकर हम दुहरायें !


वीर शहीदों ने अपने
प्राणों की बाजी लगायी
भारतमाता ने कष्टों से
तब जाकर आजादी पाई !

संकल्प ले आज हम
भारत की शान बढायेंगे
भेदभाव को दूर भगाकर
प्रेमगीत को गायेंगे !

स्वतंत्र भारत में रहे
सदा सफल गणतंत्र
मन वचन कर्म से
सफल बने यह तंत्र !


-रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

मंगलवार, 13 जनवरी 2009

दशा

गहन तिमिर है
नील गगन में
सूरज का कुछ पता नहीं
मंजिल ख़ुद ही ढूंढ़ रही है
राहों का कुछ पता नहीं !

सागर सी विस्तृत आशाएं
नया धरातल खोज रही है
मीठे जल के ढेरों उदगम
प्यासे का पता पूछ रही है !

मन है विचलित
तन अकुलाये
भ्रमित हो रही दृष्टी है
नव निर्माणित सपनों पर
होती ओलावृष्टि है !

तनिक नहीं आराम जिया में
हर पल घबराया रहता है
अपनों में बेगानों को प्
हर दम पगलाया रहता है !

- रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

रविवार, 11 जनवरी 2009

चुन्नू चला स्कूल

नटखट गोलमटोल सा
लिए हाथ में रुल
पीठ पर लादे छोटा बस्ता
चुन्नू चला स्कूल!

एक हाथ में थर्मस थामे
दूजे में लिए टाफी
ब्रेड जैम बिस्किट टिफिन में
चुन्नू के लिए काफी!

दिन भर बिता स्कूल में
होती रही बस मस्ती
घर लौटे चुन्नू को देख
मम्मी उसकी हँसती!


-रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

शनिवार, 3 जनवरी 2009

पतंग

पतंग

ठुम्मक ठुम्मक
चले हवा में
मेरी लाली लाल
पतंग


सतरंगे डोरे से
बांधी
आसमान में
नाचे पतंग


फर फर उड़ती
तितली जैसी
इठलाये बलखाये
पतंग


मन की खुशियाँ
नभ से ऊँची
उम्मीदों की
सोच पतंग


रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

शनिवार, 27 दिसंबर 2008

नया विहान

देखो नया विहान हो गया
चंदा का अवसान हो गया
सूरज चमका नई चमक से
नए साल का निर्माण हो गया !


बढ़ते कटुता के दौर में
लोगों का इमान खो गया
बची खुची मानवता से खुश
फ़िर से देखो इंसान हो गया !


प्रकृति के सुंदर फूलों से
सृष्टी का परिधान हो गया
मिल बैठ कर बतियाने से
संकट का समाधान हो गया !


नव वर्ष की शुभ बेला में
देखो मंगलगान हो गया
हँसी खुशी के नए दौर में
मानव पुनः महान हो गया !


-रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

बुधवार, 17 दिसंबर 2008

सर्दी

सर्दी

सर्दी की कुनकुनी धूप

छत पर उतर आई है

कुहासे के चादर से ढकी

अलसाई सुबह शरमाई है !

पंखुडी पर टिकी ओस

जमीं से मिलने को तैयार है

अधूरे ख्वाबों की राह में

उम्मीद की किरण ज्यादा है !

सर्द हवा हौले -हौले

मन में सिहरन फैलाती है

कुहासे की तरह अपना

विस्तार फैलाती है !

-रवि प्रकाश केशरी

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008

आशा

आशा [बाल कविता]

आशा चली स्कूल
पढ़ने बढ़ने के वास्ते
अक्षर अक्षर जोड़ने से
खुलेंगे सफलता के रास्ते

लिए हाथ में कलम
बढेगी हरदम आगे
पढने लिखने से बदलेगी
जीवन की हर परिभाषा

ज्ञान भरी किताबों में
छुपें हैं जीवन के संदेश
पढ़ने लिखने से आशा
घूम सकेगी देश विदेश


-रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

शनिवार, 6 दिसंबर 2008

आतंक के जख्म

आतंक के जख्म
आतंक के जख्म अब तक हरे है
हम अभी तक गुस्से से भरे है
ताज का हमला सीधे
दिल पर हुआ है
आतंक कब किसी मजहब से जुडा है
सीने को चीरती गोली
अब तक नसों में फंसी है
देख हमारी बुजदिली
दुनिया हम पर हँसी है
आतंक के जख्म अब तक हरे है
हम अब भी गुस्से से भरे है
कब तक हम अच्छाई
की माला जपेंगे
यह सच से डरे लोग
हमें यूं ही बर्बाद करेंगे
आतंक के जख्म अब तक हरे है
हम भी तक गुस्से से भरे है
अगर अब भी हम
नींद से नही उठेंगे
तो ये यकीनन हमें
हाशिये पर कर देंगे
आतंक के जख्म अब तक हरे है
हम अभी तक गुस्से से भरे है
आओ हम भारत के
जख्म को मरहम लगायें
चाँद आंसू शहीदों और
नफरत नेता वास्ते जगाये
क्यों की
आतंक के जख्म अब तक हरे है
भी तक गुस्से से भरे है
- रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

रविवार, 23 नवंबर 2008

aaj

आज

आज कुछ नया सा है
बाजुए फड़क रहीं हैं
माहौल बदला सा है
फिजायें महक रही हैं

आसमान अब तो देखो
कदमों तले पड़ा है
कल जिसकी पाने की न हस्ती थी
आज हासिल होने पर अडा पड़ा है

खामोश जुबान से अब
प्रवाह शब्दों का हो रहा है
अंधेरे की कारा के बाद
सूरज फिर से दमक रहा है

नजर बदल गई है
नजरिया बदल गया है
जो आँखें झुकीं थी अब तक
उनमें आसमान का ख्वाब आ गया है !

रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

गुरुवार, 20 नवंबर 2008

prakriti

प्रकृति

प्रकृति की सुन्दरता देखो
बिखरी चारों ओर है
कहीं पर पीपल कहीं अशोक
कहीं पर बरगद घोर है

लाल गुलाब से सुर्ख है
देखो धरती के दोनों गाल
लिली मोगरा और चमेली
मचा रहे है धमाल

देखो हिम से भरा हिमालय
नंदा की ऊँची पर्वत चोटी
कल कल करती बहती देखो
गंगा यमुना की निर्मल सोती

प्रकृति ने हम सबको दिया
जीवन का अनुपम संदेश
आओ मिटाए मन की दूरी
दूर हटाये कष्ट कलेश !

रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

बुधवार, 19 नवंबर 2008

jindagi

जिंदगी

बंद दरवाजे हों
या खुली खिड़किया
हर समय बढ़ती है
जिंदगी से नजदीकिया

हो के बेवफा
वफ़ा का दम भरती है
गुमनाम गलियों में रहकर
हमेशा मशहूर रहती है

सब जानते है साथ
छोड़ देगी एक दिन
फ़िर भी वादा करती है
हर पल हर दिन

कभी आम है
कभी खास है जिंदगी
कड़वे अनुभवों की
मिठास है जिंदगी

आज है कल
नही रहेगी जिंदगी
फिर भी बातों में
जिन्दा रहेगी जिंदगी

एक हमसफ़र है
राहे गुजर है जिंदगी
खुदा से खुबसूरत
अहसास है जिंदगी !

रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

मंगलवार, 11 नवंबर 2008

अद्भुत

अद्भुत है संसार

अद्भुत इसकी माया

जिसने जितना खोया

उसने उतना पाया

डूबोगे तुम जितना

उतना ही पाओगे

गर रहे किनारे खड़े

तो हाथ मलते रह जाओगे

असत्य से जीत

पास आती जायेगी

मगर रहे ध्यान यह

सत्य सा अमर ना हो पायेगी

जुदाई से बढती मोहब्बत

मोहब्बत बड़ी बेईमान

मोहब्बत बड़ा खुदा से

पर होता इससे कमजोर इंसान

रवि प्रकाश केशरी

वाराणसी