अब क्या लिखू
दरकती दीवारों से
झांकती बचपन की यादें
सूखे नीम के पेड़ पर
लटका झूला
जिस पर शायद ही
कोई झूले और
आसमान को छूले
नुक्कड़ पर खड़े पोस्ट
बाक्स पर लटका ताला
शायद उमीदों पर भी
अब ऐसे ही तालों में बंद है
चूल्हे से निकलता धुंआ
अब इशारा करता है
की पेट की आग पर
पानी पड़ चुका है
सपने में सूख चुका है
उमीदों का समुन्दर
खुशियाँ गली में फिरती
और गम दिलों के अन्दर
अब क्या लिखू
अब क्या लिखू .
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2008
बुधवार, 22 अक्टूबर 2008
तपिश
तपिश
आज सूरज अपने
रुबाब पर था
आसमान को
आग सा दहका रहा था !
दिहारी के लिए तैयार
हो रही बजंता
ने एक और फेंट
अपने सिर पर बांधी
ताकि सिर को
और सिर पर पड़े
बोझ को अच्छी तरह
से निभा सके !
सामने पड़े दुधमुहे
बच्चे की आवाज को
दरकिनार कर
निकल पड़ी मजदूरी पर
बिना तपिश की परवाह किए
क्योंकि पेट की तपिश
सूरज की तपिश से ज्यादा
होती है !
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
आज सूरज अपने
रुबाब पर था
आसमान को
आग सा दहका रहा था !
दिहारी के लिए तैयार
हो रही बजंता
ने एक और फेंट
अपने सिर पर बांधी
ताकि सिर को
और सिर पर पड़े
बोझ को अच्छी तरह
से निभा सके !
सामने पड़े दुधमुहे
बच्चे की आवाज को
दरकिनार कर
निकल पड़ी मजदूरी पर
बिना तपिश की परवाह किए
क्योंकि पेट की तपिश
सूरज की तपिश से ज्यादा
होती है !
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
सोमवार, 20 अक्टूबर 2008
मुझे चाहिए
मुझे चाहिए
मेरी ख़वाहिशो को
आसमान चाहिए
मुझे भीड़ में अपनी
पहचान चाहिए
बदलते दौर के साथ
बदलती तस्वीर में
मुझे अपने अन्दर
जागता इन्सान चाहिए
बेबसी के मारे
गम के आसुओ में
मुझे उम्मीद की एक
किरण चाहिए
पैरो में पड़े
जंजीरों के चुभन से
मुझे राहतो का
मरहम चाहिए
सिसकती रूह को
भटकती राहों से
चलते चलते
मंजिल का दामन चाहिये
पंख पसार लेने दो
मुझे आज
मौत से पहले
पूरा होना अरमान चाहिए
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
मेरी ख़वाहिशो को
आसमान चाहिए
मुझे भीड़ में अपनी
पहचान चाहिए
बदलते दौर के साथ
बदलती तस्वीर में
मुझे अपने अन्दर
जागता इन्सान चाहिए
बेबसी के मारे
गम के आसुओ में
मुझे उम्मीद की एक
किरण चाहिए
पैरो में पड़े
जंजीरों के चुभन से
मुझे राहतो का
मरहम चाहिए
सिसकती रूह को
भटकती राहों से
चलते चलते
मंजिल का दामन चाहिये
पंख पसार लेने दो
मुझे आज
मौत से पहले
पूरा होना अरमान चाहिए
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
dipavali
कंदीलों से सजी गलियां
चमके हर आँगन घर द्वार
मन की खुशियाँ नभ से ऊँची
आया दीपों का त्यौहार
झिलमिल करती फुलझरियां
लम्बी लड़ी चटाई की
तरह तरह के बने पकवान
थाली भरी मिठाई की
पूजन करके भगवन का
आओ मिलके खुशी मनाये
जीवन की कारा मिट जाए
मन में ऐसा दीप जलाये
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
चमके हर आँगन घर द्वार
मन की खुशियाँ नभ से ऊँची
आया दीपों का त्यौहार
झिलमिल करती फुलझरियां
लम्बी लड़ी चटाई की
तरह तरह के बने पकवान
थाली भरी मिठाई की
पूजन करके भगवन का
आओ मिलके खुशी मनाये
जीवन की कारा मिट जाए
मन में ऐसा दीप जलाये
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
सोमवार, 6 अक्टूबर 2008
बुधवार, 1 अक्टूबर 2008
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