सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

मुझे चाहिए

मुझे चाहिए

मेरी ख़वाहिशो को
आसमान चाहिए
मुझे भीड़ में अपनी
पहचान चाहिए

बदलते दौर के साथ
बदलती तस्वीर में
मुझे अपने अन्दर
जागता इन्सान चाहिए

बेबसी के मारे
गम के आसुओ में
मुझे उम्मीद की एक
किरण चाहिए

पैरो में पड़े
जंजीरों के चुभन से
मुझे राहतो का
मरहम चाहिए

सिसकती रूह को
भटकती राहों से
चलते चलते
मंजिल का दामन चाहिये

पंख पसार लेने दो
मुझे आज
मौत से पहले
पूरा होना अरमान चाहिए


रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

कोई टिप्पणी नहीं: