शनिवार, 27 दिसंबर 2008

नया विहान

देखो नया विहान हो गया
चंदा का अवसान हो गया
सूरज चमका नई चमक से
नए साल का निर्माण हो गया !


बढ़ते कटुता के दौर में
लोगों का इमान खो गया
बची खुची मानवता से खुश
फ़िर से देखो इंसान हो गया !


प्रकृति के सुंदर फूलों से
सृष्टी का परिधान हो गया
मिल बैठ कर बतियाने से
संकट का समाधान हो गया !


नव वर्ष की शुभ बेला में
देखो मंगलगान हो गया
हँसी खुशी के नए दौर में
मानव पुनः महान हो गया !


-रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

बुधवार, 17 दिसंबर 2008

सर्दी

सर्दी

सर्दी की कुनकुनी धूप

छत पर उतर आई है

कुहासे के चादर से ढकी

अलसाई सुबह शरमाई है !

पंखुडी पर टिकी ओस

जमीं से मिलने को तैयार है

अधूरे ख्वाबों की राह में

उम्मीद की किरण ज्यादा है !

सर्द हवा हौले -हौले

मन में सिहरन फैलाती है

कुहासे की तरह अपना

विस्तार फैलाती है !

-रवि प्रकाश केशरी

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2008

आशा

आशा [बाल कविता]

आशा चली स्कूल
पढ़ने बढ़ने के वास्ते
अक्षर अक्षर जोड़ने से
खुलेंगे सफलता के रास्ते

लिए हाथ में कलम
बढेगी हरदम आगे
पढने लिखने से बदलेगी
जीवन की हर परिभाषा

ज्ञान भरी किताबों में
छुपें हैं जीवन के संदेश
पढ़ने लिखने से आशा
घूम सकेगी देश विदेश


-रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

शनिवार, 6 दिसंबर 2008

आतंक के जख्म

आतंक के जख्म
आतंक के जख्म अब तक हरे है
हम अभी तक गुस्से से भरे है
ताज का हमला सीधे
दिल पर हुआ है
आतंक कब किसी मजहब से जुडा है
सीने को चीरती गोली
अब तक नसों में फंसी है
देख हमारी बुजदिली
दुनिया हम पर हँसी है
आतंक के जख्म अब तक हरे है
हम अब भी गुस्से से भरे है
कब तक हम अच्छाई
की माला जपेंगे
यह सच से डरे लोग
हमें यूं ही बर्बाद करेंगे
आतंक के जख्म अब तक हरे है
हम भी तक गुस्से से भरे है
अगर अब भी हम
नींद से नही उठेंगे
तो ये यकीनन हमें
हाशिये पर कर देंगे
आतंक के जख्म अब तक हरे है
हम अभी तक गुस्से से भरे है
आओ हम भारत के
जख्म को मरहम लगायें
चाँद आंसू शहीदों और
नफरत नेता वास्ते जगाये
क्यों की
आतंक के जख्म अब तक हरे है
भी तक गुस्से से भरे है
- रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

रविवार, 23 नवंबर 2008

aaj

आज

आज कुछ नया सा है
बाजुए फड़क रहीं हैं
माहौल बदला सा है
फिजायें महक रही हैं

आसमान अब तो देखो
कदमों तले पड़ा है
कल जिसकी पाने की न हस्ती थी
आज हासिल होने पर अडा पड़ा है

खामोश जुबान से अब
प्रवाह शब्दों का हो रहा है
अंधेरे की कारा के बाद
सूरज फिर से दमक रहा है

नजर बदल गई है
नजरिया बदल गया है
जो आँखें झुकीं थी अब तक
उनमें आसमान का ख्वाब आ गया है !

रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

गुरुवार, 20 नवंबर 2008

prakriti

प्रकृति

प्रकृति की सुन्दरता देखो
बिखरी चारों ओर है
कहीं पर पीपल कहीं अशोक
कहीं पर बरगद घोर है

लाल गुलाब से सुर्ख है
देखो धरती के दोनों गाल
लिली मोगरा और चमेली
मचा रहे है धमाल

देखो हिम से भरा हिमालय
नंदा की ऊँची पर्वत चोटी
कल कल करती बहती देखो
गंगा यमुना की निर्मल सोती

प्रकृति ने हम सबको दिया
जीवन का अनुपम संदेश
आओ मिटाए मन की दूरी
दूर हटाये कष्ट कलेश !

रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

बुधवार, 19 नवंबर 2008

jindagi

जिंदगी

बंद दरवाजे हों
या खुली खिड़किया
हर समय बढ़ती है
जिंदगी से नजदीकिया

हो के बेवफा
वफ़ा का दम भरती है
गुमनाम गलियों में रहकर
हमेशा मशहूर रहती है

सब जानते है साथ
छोड़ देगी एक दिन
फ़िर भी वादा करती है
हर पल हर दिन

कभी आम है
कभी खास है जिंदगी
कड़वे अनुभवों की
मिठास है जिंदगी

आज है कल
नही रहेगी जिंदगी
फिर भी बातों में
जिन्दा रहेगी जिंदगी

एक हमसफ़र है
राहे गुजर है जिंदगी
खुदा से खुबसूरत
अहसास है जिंदगी !

रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

मंगलवार, 11 नवंबर 2008

अद्भुत

अद्भुत है संसार

अद्भुत इसकी माया

जिसने जितना खोया

उसने उतना पाया

डूबोगे तुम जितना

उतना ही पाओगे

गर रहे किनारे खड़े

तो हाथ मलते रह जाओगे

असत्य से जीत

पास आती जायेगी

मगर रहे ध्यान यह

सत्य सा अमर ना हो पायेगी

जुदाई से बढती मोहब्बत

मोहब्बत बड़ी बेईमान

मोहब्बत बड़ा खुदा से

पर होता इससे कमजोर इंसान

रवि प्रकाश केशरी

वाराणसी

शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2008

अब क्या लिखू

अब क्या लिखू
दरकती दीवारों से
झांकती बचपन की यादें
सूखे नीम के पेड़ पर
लटका झूला
जिस पर शायद ही
कोई झूले और
आसमान को छूले
नुक्कड़ पर खड़े पोस्ट
बाक्स पर लटका ताला
शायद उमीदों पर भी
अब ऐसे ही तालों में बंद है
चूल्हे से निकलता धुंआ
अब इशारा करता है
की पेट की आग पर
पानी पड़ चुका है
सपने में सूख चुका है
उमीदों का समुन्दर
खुशियाँ गली में फिरती
और गम दिलों के अन्दर
अब क्या लिखू
अब क्या लिखू .


रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी



बुधवार, 22 अक्टूबर 2008

तपिश

तपिश

आज सूरज अपने
रुबाब पर था
आसमान को
आग सा दहका रहा था !

दिहारी के लिए तैयार
हो रही बजंता
ने एक और फेंट
अपने सिर पर बांधी
ताकि सिर को
और सिर पर पड़े
बोझ को अच्छी तरह
से निभा सके !

सामने पड़े दुधमुहे
बच्चे की आवाज को
दरकिनार कर
निकल पड़ी मजदूरी पर
बिना तपिश की परवाह किए
क्योंकि पेट की तपिश
सूरज की तपिश से ज्यादा
होती है !

रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

सोमवार, 20 अक्टूबर 2008

मुझे चाहिए

मुझे चाहिए

मेरी ख़वाहिशो को
आसमान चाहिए
मुझे भीड़ में अपनी
पहचान चाहिए

बदलते दौर के साथ
बदलती तस्वीर में
मुझे अपने अन्दर
जागता इन्सान चाहिए

बेबसी के मारे
गम के आसुओ में
मुझे उम्मीद की एक
किरण चाहिए

पैरो में पड़े
जंजीरों के चुभन से
मुझे राहतो का
मरहम चाहिए

सिसकती रूह को
भटकती राहों से
चलते चलते
मंजिल का दामन चाहिये

पंख पसार लेने दो
मुझे आज
मौत से पहले
पूरा होना अरमान चाहिए


रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

dipavali

कंदीलों से सजी गलियां
चमके हर आँगन घर द्वार
मन की खुशियाँ नभ से ऊँची
आया दीपों का त्यौहार

झिलमिल करती फुलझरियां
लम्बी लड़ी चटाई की
तरह तरह के बने पकवान
थाली भरी मिठाई की

पूजन करके भगवन का
आओ मिलके खुशी मनाये
जीवन की कारा मिट जाए
मन में ऐसा दीप जलाये

रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी

सोमवार, 6 अक्टूबर 2008

kadr

वो कद्र नही करते
मेरे जज्बात की
वरना यहाँ भी आग
दिल की गहराई तक है

sabd

शब्द होते है
पढने के लिए
शब्द होते है
गढ़ने के लिए
शब्द सीमा में
बांधे नही जाते
शब्द होठो से कहे नही जाते
शब्द अभूझपहेली है
शब्द तेरी मेरी
सहेली है

बुधवार, 1 अक्टूबर 2008

मिटटी

मिटटी

चंद लम्हों में सिमट जायेगी
यह हमारी जिंदगी
बस बाकी रहेगा
तो बस मिटटी
और मिटटी।

शनिवार, 27 सितंबर 2008

shyari

अच्छा है जो तू मुझे याद नही करता
मेरे लिए वक्त बर्बाद नही करता
शुक्र है जो तू ख़ुद में मशगुल है
तेरे लिए मुझे यह गम भी कबूल है !

कौन कहता है की
शमा जलाने से रोशनी होती है
मैने दिल को जलाया
पर अँधेरा कायम रहा !

रविवार, 14 सितंबर 2008

duriya

दूरियाँ


दूरिया छोटी
फासले बड़े हो गए
वास्तव में हम
बड़े हो गए,

घट गई देह से
देह की दूरी
दिलो के रिश्ते
दूर हो गए,

आसमान की
खवाहिश में हम
अरमानो के लाशो
पर खड़े हो गए,

जिंदगी की
चाहत में हम
मौत के करीब
होते हो गए,

आधुनिकता के दौर में
सभ्यता हार गई
और हम
फिर नग्न हो गए,

वास्तव में हम बड़े हो गये !


रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी