सर्दी
सर्दी की कुनकुनी धूप
छत पर उतर आई है
कुहासे के चादर से ढकी
अलसाई सुबह शरमाई है !
पंखुडी पर टिकी ओस
जमीं से मिलने को तैयार है
अधूरे ख्वाबों की राह में
उम्मीद की किरण ज्यादा है !
सर्द हवा हौले -हौले
मन में सिहरन फैलाती है
कुहासे की तरह अपना
विस्तार फैलाती है !
-रवि प्रकाश केशरी
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