बुधवार, 17 दिसंबर 2008

सर्दी

सर्दी

सर्दी की कुनकुनी धूप

छत पर उतर आई है

कुहासे के चादर से ढकी

अलसाई सुबह शरमाई है !

पंखुडी पर टिकी ओस

जमीं से मिलने को तैयार है

अधूरे ख्वाबों की राह में

उम्मीद की किरण ज्यादा है !

सर्द हवा हौले -हौले

मन में सिहरन फैलाती है

कुहासे की तरह अपना

विस्तार फैलाती है !

-रवि प्रकाश केशरी

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