आज
आज कुछ नया सा है
बाजुए फड़क रहीं हैं
माहौल बदला सा है
फिजायें महक रही हैं
आसमान अब तो देखो
कदमों तले पड़ा है
कल जिसकी पाने की न हस्ती थी
आज हासिल होने पर अडा पड़ा है
खामोश जुबान से अब
प्रवाह शब्दों का हो रहा है
अंधेरे की कारा के बाद
सूरज फिर से दमक रहा है
नजर बदल गई है
नजरिया बदल गया है
जो आँखें झुकीं थी अब तक
उनमें आसमान का ख्वाब आ गया है !
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
रविवार, 23 नवंबर 2008
गुरुवार, 20 नवंबर 2008
prakriti
प्रकृति
प्रकृति की सुन्दरता देखो
बिखरी चारों ओर है
कहीं पर पीपल कहीं अशोक
कहीं पर बरगद घोर है
लाल गुलाब से सुर्ख है
देखो धरती के दोनों गाल
लिली मोगरा और चमेली
मचा रहे है धमाल
देखो हिम से भरा हिमालय
नंदा की ऊँची पर्वत चोटी
कल कल करती बहती देखो
गंगा यमुना की निर्मल सोती
प्रकृति ने हम सबको दिया
जीवन का अनुपम संदेश
आओ मिटाए मन की दूरी
दूर हटाये कष्ट कलेश !
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
प्रकृति की सुन्दरता देखो
बिखरी चारों ओर है
कहीं पर पीपल कहीं अशोक
कहीं पर बरगद घोर है
लाल गुलाब से सुर्ख है
देखो धरती के दोनों गाल
लिली मोगरा और चमेली
मचा रहे है धमाल
देखो हिम से भरा हिमालय
नंदा की ऊँची पर्वत चोटी
कल कल करती बहती देखो
गंगा यमुना की निर्मल सोती
प्रकृति ने हम सबको दिया
जीवन का अनुपम संदेश
आओ मिटाए मन की दूरी
दूर हटाये कष्ट कलेश !
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
बुधवार, 19 नवंबर 2008
jindagi
जिंदगी
बंद दरवाजे हों
या खुली खिड़किया
हर समय बढ़ती है
जिंदगी से नजदीकिया
हो के बेवफा
वफ़ा का दम भरती है
गुमनाम गलियों में रहकर
हमेशा मशहूर रहती है
सब जानते है साथ
छोड़ देगी एक दिन
फ़िर भी वादा करती है
हर पल हर दिन
कभी आम है
कभी खास है जिंदगी
कड़वे अनुभवों की
मिठास है जिंदगी
आज है कल
नही रहेगी जिंदगी
फिर भी बातों में
जिन्दा रहेगी जिंदगी
एक हमसफ़र है
राहे गुजर है जिंदगी
खुदा से खुबसूरत
अहसास है जिंदगी !
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
बंद दरवाजे हों
या खुली खिड़किया
हर समय बढ़ती है
जिंदगी से नजदीकिया
हो के बेवफा
वफ़ा का दम भरती है
गुमनाम गलियों में रहकर
हमेशा मशहूर रहती है
सब जानते है साथ
छोड़ देगी एक दिन
फ़िर भी वादा करती है
हर पल हर दिन
कभी आम है
कभी खास है जिंदगी
कड़वे अनुभवों की
मिठास है जिंदगी
आज है कल
नही रहेगी जिंदगी
फिर भी बातों में
जिन्दा रहेगी जिंदगी
एक हमसफ़र है
राहे गुजर है जिंदगी
खुदा से खुबसूरत
अहसास है जिंदगी !
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
मंगलवार, 11 नवंबर 2008
अद्भुत
अद्भुत है संसार
अद्भुत इसकी माया
जिसने जितना खोया
उसने उतना पाया
डूबोगे तुम जितना
उतना ही पाओगे
गर रहे किनारे खड़े
तो हाथ मलते रह जाओगे
असत्य से जीत
पास आती जायेगी
मगर रहे ध्यान यह
सत्य सा अमर ना हो पायेगी
जुदाई से बढती मोहब्बत
मोहब्बत बड़ी बेईमान
मोहब्बत बड़ा खुदा से
पर होता इससे कमजोर इंसान
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
शुक्रवार, 31 अक्टूबर 2008
अब क्या लिखू
अब क्या लिखू
दरकती दीवारों से
झांकती बचपन की यादें
सूखे नीम के पेड़ पर
लटका झूला
जिस पर शायद ही
कोई झूले और
आसमान को छूले
नुक्कड़ पर खड़े पोस्ट
बाक्स पर लटका ताला
शायद उमीदों पर भी
अब ऐसे ही तालों में बंद है
चूल्हे से निकलता धुंआ
अब इशारा करता है
की पेट की आग पर
पानी पड़ चुका है
सपने में सूख चुका है
उमीदों का समुन्दर
खुशियाँ गली में फिरती
और गम दिलों के अन्दर
अब क्या लिखू
अब क्या लिखू .
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
दरकती दीवारों से
झांकती बचपन की यादें
सूखे नीम के पेड़ पर
लटका झूला
जिस पर शायद ही
कोई झूले और
आसमान को छूले
नुक्कड़ पर खड़े पोस्ट
बाक्स पर लटका ताला
शायद उमीदों पर भी
अब ऐसे ही तालों में बंद है
चूल्हे से निकलता धुंआ
अब इशारा करता है
की पेट की आग पर
पानी पड़ चुका है
सपने में सूख चुका है
उमीदों का समुन्दर
खुशियाँ गली में फिरती
और गम दिलों के अन्दर
अब क्या लिखू
अब क्या लिखू .
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
बुधवार, 22 अक्टूबर 2008
तपिश
तपिश
आज सूरज अपने
रुबाब पर था
आसमान को
आग सा दहका रहा था !
दिहारी के लिए तैयार
हो रही बजंता
ने एक और फेंट
अपने सिर पर बांधी
ताकि सिर को
और सिर पर पड़े
बोझ को अच्छी तरह
से निभा सके !
सामने पड़े दुधमुहे
बच्चे की आवाज को
दरकिनार कर
निकल पड़ी मजदूरी पर
बिना तपिश की परवाह किए
क्योंकि पेट की तपिश
सूरज की तपिश से ज्यादा
होती है !
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
आज सूरज अपने
रुबाब पर था
आसमान को
आग सा दहका रहा था !
दिहारी के लिए तैयार
हो रही बजंता
ने एक और फेंट
अपने सिर पर बांधी
ताकि सिर को
और सिर पर पड़े
बोझ को अच्छी तरह
से निभा सके !
सामने पड़े दुधमुहे
बच्चे की आवाज को
दरकिनार कर
निकल पड़ी मजदूरी पर
बिना तपिश की परवाह किए
क्योंकि पेट की तपिश
सूरज की तपिश से ज्यादा
होती है !
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
सोमवार, 20 अक्टूबर 2008
मुझे चाहिए
मुझे चाहिए
मेरी ख़वाहिशो को
आसमान चाहिए
मुझे भीड़ में अपनी
पहचान चाहिए
बदलते दौर के साथ
बदलती तस्वीर में
मुझे अपने अन्दर
जागता इन्सान चाहिए
बेबसी के मारे
गम के आसुओ में
मुझे उम्मीद की एक
किरण चाहिए
पैरो में पड़े
जंजीरों के चुभन से
मुझे राहतो का
मरहम चाहिए
सिसकती रूह को
भटकती राहों से
चलते चलते
मंजिल का दामन चाहिये
पंख पसार लेने दो
मुझे आज
मौत से पहले
पूरा होना अरमान चाहिए
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
मेरी ख़वाहिशो को
आसमान चाहिए
मुझे भीड़ में अपनी
पहचान चाहिए
बदलते दौर के साथ
बदलती तस्वीर में
मुझे अपने अन्दर
जागता इन्सान चाहिए
बेबसी के मारे
गम के आसुओ में
मुझे उम्मीद की एक
किरण चाहिए
पैरो में पड़े
जंजीरों के चुभन से
मुझे राहतो का
मरहम चाहिए
सिसकती रूह को
भटकती राहों से
चलते चलते
मंजिल का दामन चाहिये
पंख पसार लेने दो
मुझे आज
मौत से पहले
पूरा होना अरमान चाहिए
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
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