तपिश
आज सूरज अपने
रुबाब पर था
आसमान को
आग सा दहका रहा था !
दिहारी के लिए तैयार
हो रही बजंता
ने एक और फेंट
अपने सिर पर बांधी
ताकि सिर को
और सिर पर पड़े
बोझ को अच्छी तरह
से निभा सके !
सामने पड़े दुधमुहे
बच्चे की आवाज को
दरकिनार कर
निकल पड़ी मजदूरी पर
बिना तपिश की परवाह किए
क्योंकि पेट की तपिश
सूरज की तपिश से ज्यादा
होती है !
रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
बुधवार, 22 अक्टूबर 2008
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9 टिप्पणियां:
आज सूरज अपने
रुबाब पर था
आसमान को
आग सा दहका रहा था !
bahut sundar likha hai. badhayi.
बहुत बहुत स्वागत है आपका.. अच्छा लिखते हैं आप..जारी रखियेगा ज़रूर...दिनेश
नए चिट्ठे के साथ हिन्दी चिट्ठा जगत में आपका स्वागत है... आशा है आप अपनी प्रतिभा से चिट्ठा जगत को समृद्ध करेंगे.... हमारी शुभकामनाएं भी आपके साथ है।
खाकर के सूखी रोटी लहू बूँद भर बना।
फिर से लहू जला के रोटी जुटाते हैं।।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
www.manoramsuman.blogspot.com
dekh liya naa suraj bankar, ab suraj kee tarah jalakar
पेट की तपिश
सूरज की तपिश से ज्यादा
होती है !
Achi lagi kavita aapki. Swagat.
क्योंकि पेट की तपिश
सूरज की तपिश से ज्यादा
होती है ! वाह! सचमुच.
रचना उम्दा है भाई. लिखते रहना. शुभकामनाएं.
हिन्दी चिट्ठाजगत में इस नये चिट्ठे का एवं चिट्ठाकार का हार्दिक स्वागत है.
स्वागत है.
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