बस इतनी सी तकलीफ
मेरे दिल में मौजूद है
मेरे दिल तोड़ने वाला शख्स का
मेरे दिल में वजूद है !
अब तन्हाइयों बिना
जीने से डर लगता है
हर चेहरे में उसका बस
बस उसका अक्स दिखताहै !
खामोश लब झुकी निगाहें
इस बात का करती बयां है
बिना उसके मेरे लिए
क्या जमीं क्या आसमा !
-रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
सोमवार, 25 मई 2009
गुरुवार, 7 मई 2009
चुनाव पर्व
पांच साल में एक बार
आता यह त्यौहार
जनता के आगे हाथ जोड़ते
सत्ता के ठेकेदार !
सत्ता के ठेकेदार
मिलजुलकर कर बतियाते है
गर गलती से जीत गए
तो मिलकर सब चट कर जाते है !
कहे केशरी इन लोगो की
कोई नही जमात
सत्ता में आते ही मारे
जनता को दो लात !
- रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
आता यह त्यौहार
जनता के आगे हाथ जोड़ते
सत्ता के ठेकेदार !
सत्ता के ठेकेदार
मिलजुलकर कर बतियाते है
गर गलती से जीत गए
तो मिलकर सब चट कर जाते है !
कहे केशरी इन लोगो की
कोई नही जमात
सत्ता में आते ही मारे
जनता को दो लात !
- रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
शनिवार, 4 अप्रैल 2009
वोट तंत्र
वोट तंत्र के दौर में
कितने हुए बर्बाद
जली झोपड़ी पब्लिक की
महल हुए आबाद!
दिन में जो बतियाते थे
हर वादे पर हामी भरते थे
वो शाम ढले छुप जाते है
अपनों को गैर बताते है !
नित बदलते मौसम में
बदला नेताओं का चोला
पहले पहनते थे खादी
अब साथ में रखते हैं झोला!
गर चाहो अपनी खुद्दारी
तो दूर भगाओ खद्दरधारी
सच्चे अच्छे को देकर वोट
दिखाओ अपनी समझदारी !
कितने हुए बर्बाद
जली झोपड़ी पब्लिक की
महल हुए आबाद!
दिन में जो बतियाते थे
हर वादे पर हामी भरते थे
वो शाम ढले छुप जाते है
अपनों को गैर बताते है !
नित बदलते मौसम में
बदला नेताओं का चोला
पहले पहनते थे खादी
अब साथ में रखते हैं झोला!
गर चाहो अपनी खुद्दारी
तो दूर भगाओ खद्दरधारी
सच्चे अच्छे को देकर वोट
दिखाओ अपनी समझदारी !
शुक्रवार, 6 मार्च 2009
नारी {८ मार्च नारी दिवस विशेष }
वर्षो से जकड़ी जंजीरे
तोड़ दे सरे बंधन
नित आगे बढ़ने से तेरा
होगा हरदम अभिनन्दन !
घर की ऊँची दीवारों में
तू क्यों आंसू रोती है
दिया ईश ने तुझको शक्ति
फ़िर क्यो अबला बनती है !
तू सीता है तू सावित्री
तू इंदिरा तू लक्ष्मीबाई
तेरे चरणों में हरदम
दुनिया शीश झुकाती आई !
तू शिव की शक्ति है
और ईश की माया
तेरे को जिसने दुत्कारा
वो पीछे पछताया !
उठ जा तन जा हो तैयार
जग से ले लोहा एक बार
तेरे बुलंद हौसले से होगी
होगी तेरी विजय हर बार !
-रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
तोड़ दे सरे बंधन
नित आगे बढ़ने से तेरा
होगा हरदम अभिनन्दन !
घर की ऊँची दीवारों में
तू क्यों आंसू रोती है
दिया ईश ने तुझको शक्ति
फ़िर क्यो अबला बनती है !
तू सीता है तू सावित्री
तू इंदिरा तू लक्ष्मीबाई
तेरे चरणों में हरदम
दुनिया शीश झुकाती आई !
तू शिव की शक्ति है
और ईश की माया
तेरे को जिसने दुत्कारा
वो पीछे पछताया !
उठ जा तन जा हो तैयार
जग से ले लोहा एक बार
तेरे बुलंद हौसले से होगी
होगी तेरी विजय हर बार !
-रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
रविवार, 22 फ़रवरी 2009
होली
होली
रंग फुहारों से हर ओर
भींग रहा है घर आगंन
फागुन के ठंडे बयार से
थिरक रहा हर मानव मन !
लाल गुलाबी नीली पीली
खुशियाँ रंगों जैसे छायीं
ढोल मजीरे की तानों पर
बजे उमंगों की शहनाई !
गुझिया पापड़ पकवानों के
घर घर में लगते मेले
खाते गाते धूम मचाते
मन में खुशियों के फूल खिले !
रंग बिरंगी दुनिया में
हर कोई लगता एक समान
भेदभाव को दूर भागता
रंगों का यह मंगलगान !
पिचकारी के बौछारों से
चारो ओर छाई उमंग
खुशियों के सागर में डूबी
दुनिया में फैली प्रेम तरंग !
- रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
बुधवार, 21 जनवरी 2009
गणतंत्र
ले हाथों में ध्वज तिरंगा
झूम झूम कर गायें
नित उत्कर्ष हो भारत का
मिलकर हम दुहरायें !
वीर शहीदों ने अपने
प्राणों की बाजी लगायी
भारतमाता ने कष्टों से
तब जाकर आजादी पाई !
संकल्प ले आज हम
भारत की शान बढायेंगे
भेदभाव को दूर भगाकर
प्रेमगीत को गायेंगे !
स्वतंत्र भारत में रहे
सदा सफल गणतंत्र
मन वचन कर्म से
सफल बने यह तंत्र !
-रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
झूम झूम कर गायें
नित उत्कर्ष हो भारत का
मिलकर हम दुहरायें !
वीर शहीदों ने अपने
प्राणों की बाजी लगायी
भारतमाता ने कष्टों से
तब जाकर आजादी पाई !
संकल्प ले आज हम
भारत की शान बढायेंगे
भेदभाव को दूर भगाकर
प्रेमगीत को गायेंगे !
स्वतंत्र भारत में रहे
सदा सफल गणतंत्र
मन वचन कर्म से
सफल बने यह तंत्र !
-रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
मंगलवार, 13 जनवरी 2009
दशा
गहन तिमिर है
नील गगन में
सूरज का कुछ पता नहीं
मंजिल ख़ुद ही ढूंढ़ रही है
राहों का कुछ पता नहीं !
सागर सी विस्तृत आशाएं
नया धरातल खोज रही है
मीठे जल के ढेरों उदगम
प्यासे का पता पूछ रही है !
मन है विचलित
तन अकुलाये
भ्रमित हो रही दृष्टी है
नव निर्माणित सपनों पर
होती ओलावृष्टि है !
तनिक नहीं आराम जिया में
हर पल घबराया रहता है
अपनों में बेगानों को प्
हर दम पगलाया रहता है !
- रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
नील गगन में
सूरज का कुछ पता नहीं
मंजिल ख़ुद ही ढूंढ़ रही है
राहों का कुछ पता नहीं !
सागर सी विस्तृत आशाएं
नया धरातल खोज रही है
मीठे जल के ढेरों उदगम
प्यासे का पता पूछ रही है !
मन है विचलित
तन अकुलाये
भ्रमित हो रही दृष्टी है
नव निर्माणित सपनों पर
होती ओलावृष्टि है !
तनिक नहीं आराम जिया में
हर पल घबराया रहता है
अपनों में बेगानों को प्
हर दम पगलाया रहता है !
- रवि प्रकाश केशरी
वाराणसी
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